क्यों नहीं, कुछ कविताएं यूँ भी / डॉ. नीरज दइया

जो कुछ व्यक्त है उसके ठीक आस-पास, पीछे अथवा कुछ छुपा-रूठा-सा अव्यक्त झांकता है। उसे किसी भी पाठ में देखने-परखने का धैर्य आवश्यक होता है। सुधाकर पाठक के प्रथम कविता संग्रह ‘ज़िन्दगी ...कुछ यूँ ही’ की बात करें तो आवरण पर ‘ज़िन्दगी ’ शब्द के भीतर संग्रह की कविताओं के अनेक पदों से कुछ चयनित कुछ शब्दों को ज़िन्दगी में झांकते हुए प्रकट किए गए हैं। ‘ज़िन्दगी ’ शब्द अपने आप में अनेकानेक अर्थों को लिए हुए है, उन अर्थों की आभा-गरिमा इस आवरण ने बढ़ा दी है। साथ ही उसके आगे डॉट, डॉट और डॉट शीर्षक में अनेक संभावनाओं की व्यंजना कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह ज़िन्दगी के बाद का खालीपन है अथवा ‘कुछ यूँ ही’ से पहले का रिक्त स्थान? जो भी हो किंतु यहां यह रिक्तता पाठक अपनी सुविधा से पूरित करने का विकल्प पाता है, और कविता संग्रह के पाठोपरांत उसे बदल भी सकता। इस पंक्ति को ऐसे लिखा जाना चाहिए कि वह ‘ज़िन्दगी ...कुछ यूँ ही’ के रंगों की आभा में पाठोपरांत खुद को वह बदला-बदला महसूस करेगा। सुधाकर पाठक के कवि-मन की झलक कुछ ‘यूँ ही’ प्रस्तुत होते-होते धीरे धीरे पूर्णता प्राप्त करती हुईं कुछ ‘यूँ भी’ की यात्रा तक पहुंचती है।
    ज़िन्दगी  में कुछ भी यूँ ही नहीं होता, जो कुछ भी होता है और जो कुछ यूँ ही होता, उसके भी अपने होने के अभिप्राय होते हैं। किसी भी पाठ के पद-बंध कुछ ‘यूँ ही’ या ‘यूँ भी’ रचे जाते है, तब ‘ही’ और ‘भी’ की दूरियों तक आलोचना पहुंचाकर उन दिशाओं-दृश्यों को खोजती हुई पाठ की पूर्णता को प्राप्त करती है। काव्य-भाषा में चयनित शब्दों के पदाकार विन्यस्त होते ही अर्थ, अभिप्राय और संभावनाएं व्यंजित होते हैं। हर पाठ में संभावना और नवीनता का स्वागत होना चाहिए। यहां ज़िन्दगी  जैसी ज़िन्दगी  है किंतु उसे देखने-परखने और समझने-समझाने का नजरिया एक कवि का है। कोई कवि जब सहजता में कुछ यूँ ही अपना मन खोलता है, तो विभिन्न स्मृतियों-विचारों में जीवन के अनेक रहस्य-अनुभूतियां पाठकों से साझा करता है।

    कविता ‘कोल्हू का बैल’ एक बचपन के संस्मरण को व्यंजित करती कविता है। जो अपने कथ्य की मार्मिक के साथ कुछ ब्यौरा लिए प्रस्तुत होती है। निसंदेह इसमें प्रस्तुत बचपन एक अविस्मरणीय पाठ के रूप में प्रस्तुत होता है और वह हर स्मृति में कहीं टंगा-सा रह जाने वाला है। इस कविता के पाठ के साथ ही पाठक का बचपन और उस के अनेकानेक प्रश्न और शंकाएं विचार कविता के अभिप्राय में जुड़ते चले जाते हैं। हरेक पाठ और पाठक का अपना अभिप्राय किसी कविता में कब-कहां और कैसे संलग्न होता हैं? इस पर विचार करें तो लगता है कि हमारे भीतर ऐसी कोई शक्ति है जो इन सब को पाठ के साथ संलग्न करती चलती है। हर पाठ अपने पूर्ववर्ती पाठ का आगामी पाठ होता है। इसे भारतीय काव्यशास्त्र में ‘साधारणीकरण’ की संज्ञा दी गई है।
    इसी भांति ‘मकड़जाल’ कविता में मकड़ी के जाले का सरल-सहज और प्रभावशाली चित्रण है, साथ ही अंत में कविता को अपने जीवन से जोड़ना उसे नई आभा देने वाला है। यहां संभावनाओं की चर्चा करें तो विकल्प के रूप में जो पाठ कवि का है उसी के समानांतर पाठ जिस में पूर्व पाठ से मत-मतांतर भी संभव है, पाठ के कहीं आस-पास या आगे-पीछे देखे-समझे जा सकते हैं। ऐसे में जैसा कि मैंने आरंभ में पाठ को देखने-परखने का धैर्य आवश्यक रूप से होने की बात कही उसी के हवाले कहता हूं कि सुधाकर पाठक के इस संग्रह की अधिकांश कविताएं गद्य की बुनावट में सपाटबायानी है। उल्लेखनीय यह है कि यहां भाषा, शिल्प का कोई खेल कविता नहीं खेलती। वह तो बस अपनी ईमानदारी के साथ अपने जीवनानुभव और दृष्टिगोचर पृष्ठों को जैसे खोलती चलती है। अतः सुधाकर पाठक की कविताओं में उनकी सादगी और सरलता पाठक को प्रभावित करती है।
    कविता की अनेकानेक परिभाषाओं के उपरांत भी, पूर्णतः कविता को अब तक परिभाषित नहीं किया जा सका है। ऐसे में समकालीन हिंदी कविता के विविध स्वरों के बीच ज़िन्दगी का यह राग ज़िन्दगी  को समझतता-समझाता जैसे कविता की मुद्रा में हर ज़िन्दगी के कुछ रंगों और चित्रों का एक समुच्चय हैं। संभवतः कविता को लेकर कवि का यह दृष्टिकोण रहा है कि कविता हर नए कवि के हाथों नई और नई होती चली जाती है और ‘ज़िन्दगी ...कुछ यूँ ही’ आगे बढ़ती है। यहां जीवन की निरंतरात में कविता की सार्थकता समझना रेखांकित किया जाना चाहिए। ‘आत्महत्या’ कविता में जीवन के इसी पाठ को हम देखते है कि जीवन के तमाम तामझाम के बीच जो कुछ है, जैसा भी है उसे हर दिन हमें खुद को हलाल होते हुए जीना और भोगना ही जीवन है।
    इन कविताओं में घर-परिवार के आत्मीय और निजी क्षणों का चित्रण है, तो मन की ऊहापोह में चलता चिंतन और समायानुकूल विभिन्न स्थितियों को अंगीकार करने की प्रवृतियां हैं। प्रेम, राग-द्वेष और बुद्धि के साथ ज़िन्दगी  को समझने-समझाने का यह सिलसिला अपनी गद्यात्याक प्रवृति को कम करता हुआ काव्यात्मकता की दिशा में अग्रसर होगा। ‘मन करता है, / ज़िन्दगी को एक बार तो / करीने से सजाऊँ / जो जरूरी हैं ज़िन्दगी में / उन्हें कहीं से भी ढूँढ़ लाऊँ।’ कवि की यह तलाश और ‘पतंग’ आदि जैसे पारंपारिक बिंबों रूढ़ अवधारणाओं को भी अनेक स्थलों पर कविताओं में प्रस्तुत किया गया है। जब कवि ‘सब के केन्द्र’ में जिस ‘तुम’ को पाता है और उसे ही अपनी ‘सिद्धि’ और ‘साध्य’ स्वीकार भी करता है, तब होना यह चाहिए कि उसी की आशा-निराश और हर स्मृति-स्मरण में अनुभूतियों के काव्यात्मक स्वरों को समझते-साधते हुए अपने सामान्य और लौकिक रूढ़ ज्ञान का त्याग करे। ‘आदमी चुक जाता है / पर मंजिल नहीं पाता है।’ मेरा विश्वास है कि यह बोध कवि को कविताओं में अनुभूतियों की सघनता के साथ अपनी गति और दिशा की पहचान का सामर्थ्य देगा।
    कहना ना होगा कि इस संग्रह में कवि का कुछ मोह रहा है कि अनेक विद्वान रचनाकारों की राय कुछ ‘यूँ ही’ अधिक मात्रा में शामिल कर ली गई है, वैसे खुद कविताएं ज़िन्दगी  की हर बात कहने में समर्थ है। कविता को उस के समानंतर कोई पाठ सीमाओं में संकुचित करता है। अस्तु किसी पाठ के मौन-विस्तार को व्यंजित करने का स्वागत होना चाहिए, कविताओं के मौन को देखने-समझने का कुछ प्रयास करना ही इस आलेख का ध्येय रहा है। अंत में इतना ही कि समकालीन हिंदी काव्य-परिदृश्य में सुधाकर पाठक की कविताएं अपनी सहज भाषा, सरल संवाद और अनुभव की अभिव्यक्ति में गद्यायात्मक शैल्पिक कौशल के बल पर संभावनाशील कवि कहे जाने के अधिकारी हैं। मैं पुरजोर शब्दों में आशा करता हूं कि वे आगे नए अनुभवों और नई जमीन को साझा करेंगे।
- डॉ. नीरज दइया
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पुस्तक : ज़िन्दगी ...कुछ यूँ ही / विधा : कविता
कहानीकार :
सुधाकर पाठक
संस्करण : 2016, प्रथम / पृष्ठ : 110, मूल्य : 225/-
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, दिल्ली
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